Power Procurement Cost /Cost of Supply (CoS)

Power Procurement Cost या Cost of Supply (CoS) वह कुल खर्च है जो किसी DISCOM को अपने उपभोक्ताओं तक बिजली पहुँचाने में आता है। यह केवल बिजली खरीदने की लागत नहीं है, बल्कि बिजली को उत्पादन केंद्र से उपभोक्ता के मीटर तक पहुँचाने में लगने वाली पूरी प्रक्रिया का सम्मिलित व्यय है। सरल शब्दों में कहें तो CoS वही वास्तविक लागत है जिसके आधार पर बिजली के रेट तय किए जाते हैं। जब तक DISCOM को यह पता न हो कि उसे एक यूनिट बिजली पहुँचाने में कितना खर्च आ रहा है, तब तक वह उपभोक्ता से कितना टैरिफ वसूले, यह निर्धारित नहीं कर सकता।

Power Procurement Cost वह खर्च है जो DISCOM बिजली खरीदने में करता है। इसमें शामिल है:

  • Power Purchase Agreements (PPA)

  • Short-term power खरीद (Power Exchange, Traders आदि से)

  • Renewable energy खरीद

  • Fixed और Variable charges

  • Fuel Adjustment Charges (FAC/FPPCA)

Power Procurement Cost DISCOM की कुल CoS का सबसे बड़ा हिस्सा होता है — कई राज्यों में 70% से अधिक खर्च केवल बिजली खरीद में होता है।

CoS का सबसे बड़ा हिस्सा बिजली खरीद की लागत होती है। DISCOM thermal, hydro, gas, solar और wind जैसे विभिन्न स्रोतों से बिजली खरीदते हैं। हर स्रोत का अपना टैरिफ होता है, जो Power Purchase Agreement (PPA) या Competitive Bidding के आधार पर तय होता है। बिजली खरीद की यह लागत कई राज्यों में CoS का 70% से अधिक हिस्सा बनाती है। इस लागत में fixed charges, variable charges और ईंधन मूल्य परिवर्तन (Fuel Adjustment Charge) भी शामिल होते हैं।

इसके बाद आता है ट्रांसमिशन सिस्टम का खर्च। बिजली को उत्पादन केंद्र से राज्य के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाने के लिए Inter-State Transmission System (ISTS) और Intra-State Transmission System का उपयोग किया जाता है। इन दोनों के लिए ट्रांसमिशन कंपनी (जैसे PGCIL और STU) को चार्ज देना पड़ता है। साथ ही, SLDC charges और अन्य सिस्टम ऑपरेशन खर्च भी इसी में शामिल होते हैं। ये सभी खर्च CoS को बढ़ाते हैं क्योंकि बिजली लंबी दूरी तय करती है और उसके लिए एक मजबूत, सुरक्षित और उच्च-वोल्टेज नेटवर्क चाहिए होता है।

वितरण (डिस्ट्रिब्यूशन) की लागत भी CoS का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपभोक्ता तक बिजली पहुँचाने के लिए 33 kV, 11 kV और LT नेटवर्क पर कार्य किए जाते हैं। इसमें सबस्टेशन का संचालन, फॉल्ट सुधार, लाइन मेंटेनेंस, ट्रांसफॉर्मर बदलना, स्टाफ वेतन, वाहन, सामग्री आदि शामिल हैं। यह वितरण तंत्र अधिक जटिल और खर्चीला होता है क्योंकि यह उपभोक्ता स्तर तक फैला हुआ है और लगातार रखरखाव की आवश्यकता होती है।

CoS में लाइन लॉस और घाटे का समायोजन भी जोड़ा जाता है। बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में तकनीकी नुकसान (Technical Losses) होते हैं, जबकि मीटरिंग त्रुटि या चोरी (Commercial Losses) भी कई जगह मौजूद हैं। DISCOM इन नुकसानों को अपने CoS में शामिल करता है ताकि कुल वास्तविक लागत का सही आकलन हो सके। अगर किसी क्षेत्र में लॉस अधिक है, तो उस राज्य का CoS स्वाभाविक रूप से अधिक हो जाता है।

इन सभी खर्चों को जोड़कर कुल वार्षिक लागत निकाल ली जाती है और फिर इसे कुल बिकने वाली बिजली (Units Sold) से विभाजित किया जाता है। इसी से प्रति यूनिट CoS निकलता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी DISCOM का कुल खर्च 20,000 करोड़ रुपये है और उसने 50,000 मिलियन यूनिट बिजली बेची है, तो उसका CoS लगभग ₹4 प्रति यूनिट होगा। इसका मतलब यह है कि DISCOM को 1 यूनिट बिजली उपभोक्ता तक पहुँचाने में कुल ₹4 का खर्च आता है।

यही Cost of Supply बिजली दरों के निर्धारण की आधारशिला होती है। राज्य की बिजली नियामक आयोग (SERC) CoS को देखकर ही यह तय करता है कि घरेलू, औद्योगिक, व्यावसायिक और कृषि उपभोक्ताओं को बिजली किस दर पर मिलनी चाहिए। अक्सर घरेलू उपभोक्ताओं को CoS से कम दर पर बिजली दी जाती है, जिसकी भरपाई राज्य सरकार सब्सिडी देकर करती है। इसी तरह कुछ उपभोक्ता श्रेणियों को क्रॉस-सब्सिडी भी दी जाती है, यानी उद्योगों से अधिक दर वसूली जाती है ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिल सके।

कुल मिलाकर, Cost of Supply बिजली क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय सूचक है। DISCOM का लाभ या घाटा इसी पर निर्भर करता है। यदि CoS बिजली विक्रय दर से अधिक है, तो DISCOM लगातार नुकसान में चलता है। यदि CoS बराबर या कम है, तो DISCOM वित्तीय रूप से स्वस्थ माना जाता है। इसलिए CoS को समझना बिजली क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को समझने जैसा है — जितना सही यह आंकलन होगा, उतनी बेहतर बिजली व्यवस्था चल सकती है।

Cost of Supply (CoS) में कौन-कौन से खर्च शामिल होते हैं?

CoS केवल बिजली खरीद नहीं है — इसमें उत्पादन से उपभोक्ता तक पहुँचाने तक की पूरी लागत शामिल होती है।

  1️⃣   बिजली खरीद की लागत (Power Purchase Cost)

  • Thermal, Hydro, Gas, Solar, Wind आदि से खरीदी गई बिजली

  • Fixed Charges + Variable Charges

  • PPA आधारित या TBCB बोली के अनुसार टैरिफ

  2️⃣   ट्रांसमिशन चार्ज (Transmission Charges)

यह लागत बिजली को प्लांट से राज्य/शहर तक लाने में खर्च होती है—

  • Inter-State Transmission (ISTS) charges

  • Intra-State Transmission charges

  • SLDC charges

ये चार्ज PGCIL और State Transmission Utilities (STU) को दिए जाते हैं।

  3️⃣   Distribution Network Cost (वितरण लागत)

यह खर्च 33 kV / 11 kV / LT नेटवर्क से संबंधित होता है:

  • 33/11 kV Substations

  • Distribution Transformers

  • लाइन लॉसेस की भरपाई

  • O&M (Operation & Maintenance) खर्च

  • Fault rectification, staff, vehicle, material आदि

  4️⃣   Losses Adjustment (घाटे का समायोजन)

बिजली को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाते समय तकनीकी और गैर-तकनीकी दोनों तरह के नुकसान होते हैं।

  • Technical Losses (Transformers, lines)

  • Commercial Losses (metering errors, theft)

DISCOM इन नुकसानों को भी CoS में जोड़ता है।

  5️⃣   Administrative & Other Costs (अन्य खर्च)

  • बिलिंग

  • मीटरिंग

  • Customer service

  • IT systems

  • Regulatory fees

CoS कैसे निकलता है?

एक यूनिट (kWh) बिजली की औसत लागत =
Total DISCOM expenditure ÷ Total units sold

उदाहरण:

  • DISCOM का कुल वार्षिक खर्च = ₹20,000 करोड़

  • कुल बिकने वाली यूनिट = 50,000 मिलियन यूनिट (MU)

तो CoS = ₹20,000 करोड़ / 50,000 MU = ₹4.00 प्रति यूनिट

यानी DISCOM को 1 यूनिट बिजली उपभोक्ता तक पहुँचाने में ₹4.00 का खर्च आता है।


CoS के आधार पर ही बिजली के रेट तय होते हैं

State Electricity Regulatory Commissions (SERCs) CoS देखकर ही तय करते हैं:

  • घरेलू उपभोक्ता

  • औद्योगिक उपभोक्ता

  • व्यावसायिक उपभोक्ता

  • कृषि उपभोक्ता

को किस रेट पर बिजली मिलेगी।

अक्सर घरेलू उपभोक्ताओं को सब्सिडी दी जाती है, यानी उन्हें CoS से भी सस्ता टैरिफ मिलता है।
इस सब्सिडी की भरपाई राज्य सरकार करती है।

CoS का महत्व क्यों है?

CoS ही DISCOM की वित्तीय सेहत तय करता है:

  • यदि CoS > Average Billing Rate, तो DISCOM को नुकसान

  • यदि CoS = Average Billing Rate, तो ब्रेक-ईवन

  • यदि CoS < Average Billing Rate, तो DISCOM को लाभ

भारत के अधिकांश DISCOMs का CoS बिक्री दर से ज्यादा है — इसलिए वे घाटे में चलते हैं।

निष्कर्ष

Cost of Supply (CoS) वह कुल खर्च है जो DISCOM को बिजली खरीदने, ले जाने और उपभोक्ता तक पहुँचाने में लगता है।
इसी लागत पर पूरी की पूरी बिजली व्यवस्था आधारित होती है —
यही तय करती है कि उपभोक्ता को बिजली कितने की मिलेगी, सब्सिडी कितनी होगी और DISCOM लाभ में है या नुकसान में।