Average Billing Rate-ABR
ABR यानी Average Billing Rate वह औसत दर है जिस पर कोई DISCOM अपने सभी उपभोक्ताओं से बिजली की बिक्री पर कुल राजस्व प्राप्त करता है। यह दर किसी एक उपभोक्ता वर्ग की नहीं होती, बल्कि घरेलू, औद्योगिक, व्यावसायिक, कृषि और अन्य सभी वर्गों से वसूली गई कुल बिलिंग को मिलाकर निकाली जाती है। सरल शब्दों में, ABR यह बताता है कि डिस्कॉम प्रति यूनिट बिजली बेचकर औसतन कितनी राशि कमा रहा है।
ABR निकालने का तरीका बहुत आसान है। किसी अवधि—जैसे एक महीने, एक तिमाही या एक वर्ष—में DISCOM ने जितनी कुल बिलिंग की है, उसे उसी अवधि में बेची गई कुल यूनिट्स से विभाजित कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी DISCOM ने एक महीने में ₹1000 करोड़ की कुल बिलिंग की और उसी अवधि में 5000 मिलियन यूनिट (MU) बिजली बेची, तो उसका ABR होगा ₹1000/5000 = ₹2 प्रति यूनिट। इसका मतलब यह है कि औसतन DISCOM हर यूनिट बिजली बेचकर केवल ₹2 प्राप्त कर रहा है, चाहे कुछ उपभोक्ता ₹1 से भी कम दे रहे हों और कुछ ₹7–8 प्रति यूनिट भी दे रहे हों।
ABR, DISCOM की वित्तीय स्थिति समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि ABR, ACoS (Average Cost of Supply) से अधिक है तो DISCOM लाभ में रहता है, जबकि यदि ABR, ACoS से कम है, तो DISCOM को नुकसान होता है क्योंकि उसे अपनी लागत से कम कीमत पर बिजली बेचनी पड़ रही है। भारत के अधिकांश राज्यों में यही स्थिति देखने को मिलती है कि ABR, ACoS से कम है, जिसके कारण DISCOM लगातार घाटे में चलते हैं और उन्हें सब्सिडी या टैरिफ संशोधन की आवश्यकता होती है।
ABR यह भी दर्शाता है कि किसी राज्य की टैरिफ संरचना कितनी संतुलित है। यदि ABR बहुत कम है, तो इसका मतलब है कि बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं को सब्सिडी दी जा रही है। यदि ABR बहुत अधिक है, तो यह दर्शाता है कि उपभोक्ताओं पर बिजली का बोझ भारी है या Cross-Subsidy का स्तर ज्यादा है। इसलिए बिजली नियामक आयोग हर वर्ष ABR और ACoS की तुलना करके यह तय करता है कि टैरिफ में बदलाव की आवश्यकता है या नहीं। ABR को समझकर ही DISCOM की वास्तविक वसूली क्षमता और वित्तीय स्वास्थ्य का सही अनुमान लगाया जा सकता है।