Average Cost of Supply-ACoS
ACoS यानी Average Cost of Supply वह औसत लागत है जो किसी DISCOM को अपने उपभोक्ताओं तक बिजली पहुँचाने में प्रति यूनिट खर्च होती है। इसमें बिजली खरीद, ट्रांसमिशन चार्ज, वितरण खर्च, लाइन लॉस, स्टाफ, रखरखाव और प्रशासनिक सभी तरह की लागतें शामिल होती हैं। इन सभी खर्चों को जोड़कर और कुल बेची गई यूनिट से विभाजित करके ACoS निकाला जाता है। यह DISCOM की वास्तविक आर्थिक स्थिति का सबसे साफ़ संकेतक होता है कि उसे एक यूनिट बिजली आपूर्ति करने में कुल कितना खर्च बैठ रहा है।
यदि ACoS उस कीमत (ABR – Average Billing Rate) से अधिक है जिस पर DISCOM उपभोक्ताओं को बिजली बेच रहा है, तो इसका मतलब है कि DISCOM हर यूनिट पर नुकसान झेल रहा है। उदाहरण के लिए, यदि किसी DISCOM का ACoS ₹7 प्रति यूनिट है लेकिन वह उपभोक्ताओं से औसतन ₹5 प्रति यूनिट ही वसूल पा रहा है, तो प्रति यूनिट ₹2 का घाटा होगा। यही घाटा समय के साथ बढ़ते-बढ़ते DISCOM की वित्तीय स्थिति को कमजोर कर देता है। भारत के कई राज्यों में यही स्थिति देखने को मिलती है।
जब भी ACoS और ABR के बीच बड़ा अंतर होता है, DISCOM या राज्य सरकारें नियामक आयोग से बिजली की दरें बढ़ाने या राज्य सरकार से अधिक सब्सिडी देने की मांग करती हैं। यदि इस अंतर को समय पर नियंत्रित न किया जाए तो DISCOM को उधारी बढ़ानी पड़ती है, भुगतान में देरी होती है, पावर प्लांट्स को उनके बिल समय पर नहीं मिलते और अंत में पूरी बिजली आपूर्ति प्रणाली पर दबाव आता है। इसलिए वार्षिक टैरिफ याचिकाओं में अक्सर इस बात पर जोर दिया जाता है कि या तो उपभोक्ता दरें बढ़ाई जाएँ या सरकार अतिरिक्त सब्सिडी दे, ताकि ACoS और ABR का अंतर कम हो सके।