Anuual Revenue Requirement

Annual Revenue Requirement (ARR) वह कुल वार्षिक राशि है जिसकी आवश्यकता किसी DISCOM या विद्युत वितरण कंपनी को पूरे वर्ष तक बिजली आपूर्ति व्यवस्था चलाने के लिए होती है। इसमें बिजली खरीद, ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क के संचालन, स्टाफ वेतन, मेंटेनेंस, मरम्मत, प्रशासनिक खर्च, ऋण पर ब्याज, मूल्यह्रास (Depreciation), और नियामक रूप से अनुमत लाभ (Return on Equity) जैसी सभी लागतें शामिल होती हैं। सरल शब्दों में, ARR उस कुल खर्च का योग है जिसे पूरा किए बिना DISCOM उपभोक्ताओं तक बिजली आपूर्ति चालू नहीं रख सकता।

ARR की गणना पूरे वर्ष के लिए की जाती है और राज्य बिजली नियामक आयोग (SERC) के समक्ष टैरिफ याचिका में प्रस्तुत की जाती है। आयोग इन आंकड़ों की जांच करता है कि खर्च वाजिब है या नहीं, और उसी आधार पर तय करता है कि DISCOM को अगले वर्ष बिजली किस दर पर बेचने की अनुमति दी जाए। यदि ARR अधिक है और राजस्व कम, तो DISCOM घाटे में जाता है और उसे टैरिफ बढ़ाने, सब्सिडी लेने या खर्च कम करने की जरूरत पड़ती है। वहीं यदि ARR और वसूली बराबर हो जाती है, तो DISCOM वित्तीय संतुलन में माना जाता है।

ARR के अंदर सबसे बड़ा हिस्सा बिजली खरीद की लागत होता है, क्योंकि भारत में अधिकांश DISCOM अपनी जरूरत की बिजली उत्पादकों से खरीदते हैं। इसके बाद ट्रांसमिशन चार्ज, वितरण नेटवर्क का खर्च और तकनीकी व वाणिज्यिक नुकसान (AT&C Losses) का प्रभाव आता है। यदि AT&C लॉस अधिक है, तो ARR भी बढ़ जाता है क्योंकि DISCOM को बेची गई हर यूनिट के बदले अधिक खर्च वहन करना पड़ता है। इसी कारण राज्य आयोग अक्सर DISCOM को लॉस कम करने और दक्षता बढ़ाने के निर्देश देते हैं।

कुल मिलाकर, Annual Revenue Requirement बिजली टैरिफ निर्धारण की मूल नींव है। यही वह गणना है जिसके आधार पर यह तय होता है कि अगले वित्त वर्ष में उपभोक्ताओं को बिजली किस दर पर मिलेगी, कितनी सब्सिडी की आवश्यकता है, और DISCOM की वित्तीय सेहत कैसी है। ARR को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बिजली क्षेत्र की पूरी लागत संरचना और उसका आर्थिक संतुलन समाहित होता है।

Average Revenue Realised

Average Revenue Realised (ARR या कभी-कभी ARRR लिखा जाता है) वह औसत वास्तविक राजस्व है जो DISCOM को प्रति यूनिट बिजली बेचने पर प्राप्त होता है। यह Average Billing Rate (ABR) जैसा ही सूचक है, लेकिन इसमें वास्तव में प्राप्त हुई राशि गिनी जाती है—यानि उपभोक्ताओं से जितना पैसा बिलिंग के बाद DISCOM के खाते में पहुँचा, वही इसका आधार होता है।

सभी उपभोक्ताओं—घरेलू, औद्योगिक, व्यावसायिक, कृषि, सरकारी—से प्राप्त कुल आय को एक निश्चित अवधि (अक्सर एक वर्ष) में बेची गई कुल यूनिट बिजली से विभाजित करके Average Revenue Realised निकाला जाता है। यह DISCOM की वास्तविक वसूली क्षमता को दर्शाता है क्योंकि कई बार बिल तो जारी हो जाता है, लेकिन वसूली पूरी नहीं होती, बकाया बढ़ता है, या सरकार से मिलने वाली सब्सिडी समय पर नहीं आती। इसलिए ABR और ARR(R) में फर्क हो सकता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी DISCOM ने एक वर्ष में सभी उपभोक्ताओं से मिलाकर ₹900 करोड़ की वास्तविक वसूली की और उसी दौरान 5000 MU बिजली बेची, तो उसका Average Revenue Realised होगा: 900/5000 = ₹1.80 प्रति यूनिट। इसका अर्थ है कि DISCOM वास्तव में हर यूनिट बेचकर औसतन ₹1.80 ही कमा पा रहा है, जबकि उसकी सप्लाई लागत (ACoS) मान लीजिए ₹6 प्रति यूनिट है, तो प्रति यूनिट भारी घाटा होता है।

Average Revenue Realised बिजली वितरण क्षेत्र की वित्तीय सेहत का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक है, क्योंकि यह दिखाता है कि वसूली कितनी प्रभावी है, सब्सिडी समय पर मिल रही है या नहीं, और DISCOM अपने खर्च की तुलना में कितनी आय वास्तव में प्राप्त कर रहा है। यदि ARR(R) लगातार ACoS से कम रहता है, तो DISCOM का घाटा बढ़ता जाता है और उसे या तो टैरिफ बढ़ाने, या सब्सिडी बढ़वाने, या लॉस और बकाया कम करने जैसी सुधारात्मक कार्रवाई करनी पड़ती है।