Return On Equity
Return on Equity (RoE) बिजली क्षेत्र में वह अनुमत लाभ है जो किसी DISCOM, Transmission Utility या Generation Company को उसके निवेश (Equity) पर कमाने की अनुमति दी जाती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि कंपनी ने अपने संसाधन या पूंजी निवेश करके नेटवर्क बनाया, तो नियामक आयोग उसे उस निवेश पर एक निश्चित प्रतिशत लाभ कमाने का अधिकार देता है। यह लाभ खर्च का हिस्सा नहीं, बल्कि नियामक द्वारा मान्य मुनाफा होता है।
बिजली क्षेत्र एक नियंत्रित (regulated) सेक्टर है, इसलिए यहाँ कंपनियाँ अपनी मर्ज़ी से लाभ नहीं कमातीं। राज्य या केंद्रीय बिजली नियामक आयोग (SERC/CERC) यह तय करता है कि कंपनी को अपनी Equity पर कितने प्रतिशत रिटर्न की अनुमति होगी। आमतौर पर भारत में RoE की अनुमत दर 14% से 15.5% तक होती है। उदाहरण के लिए, अगर किसी ट्रांसमिशन कंपनी ने ₹100 करोड़ की Equity निवेश की है और RoE 15.5% तय है, तो उसे हर वर्ष ₹15.5 करोड़ Return on Equity के रूप में कमाने की अनुमति होगी।
RoE इसलिए दिया जाता है ताकि कंपनियाँ नई ट्रांसमिशन लाइनें, सबस्टेशन और वितरण नेटवर्क में निवेश करने के लिए प्रेरित हों। यदि RoE न दिया जाए, या बहुत कम दिया जाए, तो निजी कंपनियाँ बिजली क्षेत्र में निवेश नहीं करेंगी क्योंकि इस उद्योग में जोखिम ज्यादा होता है और लागत वापस पाने में कई साल लगते हैं। इसलिए RoE बिजली ढाँचा (infrastructure) विकसित करने की आवश्यक प्रेरणा प्रदान करता है।
यह Return on Equity, DISCOM या Transmission Utility की Annual Revenue Requirement (ARR) का हिस्सा होता है। ARR बनाते समय—Power Purchase Cost, O&M खर्च, Depreciation, Interest on Loan आदि के साथ RoE भी जोड़ा जाता है। उपभोक्ताओं से जो टैरिफ वसूला जाता है, उसमें इस RoE की भरपाई भी शामिल होती है। यदि RoE बहुत अधिक तय कर दिया जाए, तो बिजली दरें अनावश्यक रूप से बढ़ सकती हैं; यदि बहुत कम रखा जाए तो कंपनियाँ निवेश करना बंद कर सकती हैं। इसलिए नियामक आयोग RoE को संतुलित स्तर पर तय करते हैं।
कुल मिलाकर, Return on Equity वह नियामक-स्वीकृत लाभ है जो किसी बिजली कंपनी को उसके निवेश पर दिया जाता है, जिससे वह वित्तीय रूप से मजबूत रहे, अपने नेटवर्क में निवेश करती रहे और बिजली प्रणाली स्थिर और विश्वसनीय बनी रहे। यह बिजली क्षेत्र के आर्थिक ढाँचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।