Tariff
Tariff वह दर या कीमत है जिस पर उपभोक्ताओं को बिजली बेची जाती है। बिजली क्षेत्र में “टैरिफ” का मतलब प्रति यूनिट (kWh) बिजली की वह राशि है जिसे किसी DISCOM को उपभोक्ता से प्राप्त होती है। यह कीमत राज्य बिजली नियामक आयोग (SERC) द्वारा निर्धारित की जाती है और इसका आधार होता है—DISCOM की लागत, बिजली खरीद, नेटवर्क का खर्च, लाइन लॉस, सब्सिडी, और उपभोक्ता श्रेणियाँ।
टैरिफ हर उपभोक्ता वर्ग के लिए अलग-अलग हो सकता है। घरेलू उपभोक्ता कम दर देते हैं, कृषि और गरीब उपभोक्ताओं को रियायत मिलती है, जबकि औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत अधिक दर चुकानी पड़ती है। यह अंतर इसलिए होता है ताकि सामाजिक रूप से कमजोर उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दी जा सके और DISCOM को Cross Subsidy के माध्यम से वित्तीय संतुलन बनाए रखने में सहायता मिल सके।
टैरिफ निर्धारित करने से पहले यह देखा जाता है कि DISCOM की कुल वार्षिक आवश्यकता (ARR), औसत लागत (ACoS), औसत राजस्व (ABR या Average Revenue Realised) और लॉस कितने हैं। यदि DISCOM को लागत अधिक और राजस्व कम मिल रहा है, तो वह टैरिफ बढ़ाने या अतिरिक्त सब्सिडी की मांग करता है। यदि परिस्थिति बेहतर है, तो टैरिफ स्थिर रह सकता है।
Tariff क्यों तय किया जाता है?
बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण पर भारी खर्च होता है।
इन खर्चों की भरपाई करने के लिए कंपनियों को जो न्यूनतम पैसा चाहिए, वही Tariff बनता है।
इसमें शामिल होता है:
बिजली खरीदने की लागत
ट्रांसमिशन चार्ज
वितरण नेटवर्क का खर्च
कर्मचारियों का वेतन
नेटवर्क की मरम्मत
मीटरिंग और बिलिंग
लाइनों की जांच
तकनीकी व व्यावसायिक हानियाँ (AT&C Losses)
नियामक द्वारा तय Return on Equity
इन सभी खर्चों को जोड़कर एक दर (₹/Unit) बनाई जाती है। यह दर ही Tariff कहलाती है।
Tariff कैसे तय होता है?
DISCOM आयोग को अपना ARR फ़ाइल करता है।
आयोग उसकी जाँच करता है।
सार्वजनिक सुनवाई (Public Hearing) होती है।
आयोग एक आदेश जारी करता है।
उसी आदेश के आधार पर अगले साल का Tariff लागू होता है।
उपभोक्ता के लिए Tariff का क्या अर्थ है?
आप अपनी बिजली बिल में जितना “₹/Unit” देखते हैं, वही Tariff है।
इसमें Fixed Charge + Energy Charge दोनों शामिल होते हैं।
यदि Tariff बढ़ता है तो बिल बढ़ता है।
यदि सरकार Subsidy देती है तो उपभोक्ता का प्रभावी Tariff कम हो जाता है।
Tariff और Subsidy का संबंध
यदि ACoS (औसत खर्च) = ₹7/unit
और सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को ₹2/unit की सब्सिडी देती है,
तो उपभोक्ता को केवल ₹5/unit देना होगा।
इसलिए कई राज्यों में Tariff कम दिखता है लेकिन वास्तविक खर्च ज्यादा होता है — अंतर सरकार देती है।
Tariff क्यों महत्वपूर्ण है?
Tariff किसी भी राज्य की बिजली व्यवस्था की वित्तीय सेहत का केंद्र है।
यह निर्धारित करता है:
DISCOM घाटे में रहेगा या मुनाफे में
राज्य पर सब्सिडी का बोझ कितना होगा
उद्योग की उत्पादन लागत कितनी बढ़ेगी
उपभोक्ता का मासिक बिल कितना होगा
बिजली कंपनियों में निवेश कितना आएगा
नेटवर्क कितना मजबूत बनाया जा सकेगा